गांव की ओर

पगडंडी को छोड़ खड़ा हूँ
उसी गांव की ओर खड़ा हूँ
अपने ख्वाबों के माफिक मैं
उससे रिश्ते तोड़ खड़ा हूँ।
बेहन की हरियाली लखकर
सरसो के फूलों को छूकर
मिट्टी की सोंधी खुशबू को
सांसों की झोली में भरकर
शहरों के कोलाहल भूला
उसी ओर पर निकल पड़ा हूँ
पगडंडी को छोड़ खड़ा हूँ
उसी गांव की ओर खड़ा हूँ
जुड़ती सड़कों पर बस आकर
ले जाती जो गांव छुड़ाकर
उन्ही बसों के इंतज़ार में
बेबस और लाचार खड़ा हूँ
पगडंडी को छोड़ खड़ा हूँ
उसी गांव की ओर खड़ा हूँ
सहज चहकते गांव में क्यों
सूनापन सा दिखता है अब
दादी के आंखों में पानी
छुपता छुपता दिखता है जब
मैं अपने बक्सों को लेकर
सड़कों पर अब निकल पड़ा हूँ
पगडंडी को छोड़ खड़ा हूँ
उसी गांव की ओर खड़ा हूँ ।।

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