जीवन की ओर

रात रात भर जाग जाग कर

पलट पलट पन्ने जो देखे,

कुछ चित्र थे बड़े सुखकर

कुछ में केवल दुख भरे थे।

 

कोरा पन्ना मिला न मुझको

हर एक पर था कोई रंग,

खोने पाने के न जाने देखो

उतार चढ़ाव से मै थी दंग।

 

शब्द कहीं बहते कविता से

कहीं भाव रेह गए निशब्द,

प्रेम घृणा की नयी व्याख्या से

झकझोर मन फिर हुआ स्तब्ध।

 

हाँ, जन्म से शुरू हुई कहानी

मृत्यु निश्चित था अंतिम छोर,

जागकर पुस्तक पढ़ी पुरानी

सुबह चले फिर जीवन की ओर।

Leave a Reply