बुढ़ापा- जीवन का दूसरा बचपन

” छोड़ देते है हम उन्हे “

“छोड़ देते हैं हम उन्हें जिंदगी के उस मोड़ पर जब उन्हें ज़रूरत होती है हमारी सबसे ज्यादा”“

छोड़ देते हैं हम उन्हें उस सफ़र में अकेला जब उन्हे पैदल चलने के लिए भी चाहिए होता है एक सहारा”

“छोड़ देते हैं हम उन्हें उस बंजर घर में जब उन्हें कोई साथ में चाहिए होता है किल- कारी मारने वाला”
“छोड़ देते हैं हम उन्हें उस अंजान शहर में जब उन्हें चाहिए होता है कोई elevator चढ़ने बताने वाला”

“छोड़ देते हैं हम उन्हें उस बेजान दुनिया में जब उन पर जान न्यो- छाव- र करने वाला कोई नहीं होता “

“छोड़ देते हैं हम उन्हे जिंदगी के उस मोड़ पे जब उन्हे चाहिए होता है कोई बिना बोले ही समझने वाला “

“छोड़ देते हैं हम उन्हें उस सफ़र में अकेला जब हो जाती है उनकी नज़रें कुछ धुँधला “

“छोड़ देते हैं हम उन्हें उस बंजर घर में जब कोई होता नहीं वहाँ उन्हे सुनने वाला मंज़र ““

छोड़ देते हैं हम उन्हें उस अंजान शहर में जब उन्हें अंदेखा करते हैं लोग जान- पहचान “

“छोड़ देते हैं हम उन्हें उस बेजान दुनिया में जब उनमें बची होती है चंद लम्हों की जान “

“छोड़ देते हैं हम उन्हें जीवन के उस मोड़ पे तन्हा जब उन्हें चाहिए होती है मोहब्बत बेपन्हा”

“छोड़ देते है हम उन्हें उस सफ़र में अकेला जब उन्हें पता नहीं होता सफ़र का ही इंतला “

“छोड़ देते हैं हम उन्हें उस बंजर घर में जब उन्हें बस लगता है चीर दे कोई सीने में खंजर “

“छोड़ देते हैं हम उन्हें उस अंजान शहर में जब उन्हें याद ही नही रहता ख़ुद का ही नाम “

“छोड़ देते हैं हम उन्हें उस बेजान दुनिया में जब उन्हें ज़रूरत होती है किसी जान (प्रिय) की “
~Mridula~

Leave a Reply