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आह्वान – सौरभ कुदेशिया | पुस्तक समीक्षा

किसी भी सस्पेन्स-थ्रिलर की समीक्षा लिखना हमेशा दुरूह कार्य होता है।एक तरफ़ तो कहानी की परतों को उघड़ने नहीं देना होता है,दूसरी तरफ़ समीक्षा के मानकों के साथ भी न्याय करना होता है।’आव्हान’ की समीक्षा लिखने में इन्हीं कुछ सीमाओं के भीतर इस पर चर्चा का साहस और प्रयास कर रहा हूँ।

उपन्यास  की पृष्ठभूमि भारतवर्ष की समृद्ध सनातन परम्परा के वैशिष्ट्य की ठोस मान्यताओं का आलम्ब लेती है,और इन्हीं मान्यताओं के अन्वेषणात्मक दृष्टिकोणों से प्राप्त सकारात्मक पक्षों को आधुनिक फिक्शन लेखन में मुखर करने का प्रयत्न करती है।यह प्रयत्न सफल है या असफल इस प्रश्न का हल पाठक स्वयं ढूंढें तो बेहतर है।
कहानी का पहला अध्याय ‘प्रोटोकॉल’ एक कार-दुर्घटना  और दूसरा अध्याय ‘प्रारब्ध’ हिरण्यगर्भ की अग्नि के रक्षक मुमुक्षुओं की प्रतिज्ञा से दो समान्तर घटनाक्रमों को शुरू करते हैं।

 

कहानी इन  दो समानांतर घटनाक्रमों को लेकर चलती है,ठीक वैसे ही जैसे विद्युत के दो तार और बीच-बीच में ये तार एक-दूसरे को छू जाते हैं,और स्पार्क होता है।इन दोनों कहानियों के निरपेक्ष एक तीसरा दृष्टिकोण भी इनके मूल में चल रहा होता है,जिसकी पर्तों का एक-एक करके उघड़ना उपन्यास के सस्पेन्स को क़ायम रखता है।यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे ये दो तारों का समानांतर दूर होना जितना सत्य है उतना ही सत्य है इनका एक ही ग्रिड से निकला होना।

यह कहानी चूँकि बहुत  विराट लक्ष्य की प्राप्ति के सकारात्मक-नकारात्मक शक्तियों  के प्रयास की कहानी है अतः कहानी पढ़ते समय हर सामान्य सी लगने वाली घटना भी पाठक को महत्वपूर्ण लगती है,यह उपन्यास की सफलता है जो पाठक को बांधे रहती है।जैसे ऋग्वेद से उद्धृत हिरण्यगर्भ की अग्नि की संकल्पना को समझें तो

“हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्”
अर्थात
सृष्टि के आदि में था हिरण्यगर्भ ही केवल जो सभी प्राणियों का प्रकट अधीश्वर था।”

 

हम पाते हैं कि यह कहानी सामान्य लक्ष्यों,साधन और साध्यों तक नहीं सीमित है यह सृष्टि के आदि उद्गम स्त्रोत अर्थात अस्तित्व के बचने न बचने के प्रश्न से जूझती दीख पड़ती है।जो पाठक को रुचिकर तत्वों से बांधे रहती है।

 

भाषा और संवाद शैली पर टिप्पणी थोड़ी जटिल है।पौराणिक सन्दर्भों का हर अध्यायान्त में वर्णन इतिहासकारों की पुस्तकें,एकेडमिक पुस्तकों का प्रारूप है,उपन्यास में ये फ्रेमवर्क नया है।चूँकि एक पाठक के तौर पर मुझे असुविधा नहीं हुई इसलिए मुझे इससे कोई शिक़ायत नहीं है लेक़िन पाठक भिन्न-भिन्न प्रकृति के होते हैं,उनके उपन्यास को लेकर जो आग्रह हैं वो इसपर कितना सहमत या असहमत रहते हैं यह देखने वाली बात होगी।

भाषा आम बोलचाल के शब्दों का प्राचुर्य लिए हुए कहीं-कहीं पर रहस्यमयी अटपटापन लिए हुए है। बिना कहानी के सस्पेन्स से छेड़छाड़ किये भिखारी और जयन्त के संवाद को देखें तो उतने नाज़ुक समय पर भिखारी के हर शब्द में पहेली बुझाना अटपटा सा लगता है,जिसका जस्टिफिकेशन अन्त के अध्याय में मिलता है। कहीं-कहीं शुद्ध तत्सम संवाद कहानी की माँग के अनुसार हैं जो आकर्षक भी हैं,निम्न दो संवाद देखें:-

१-‘जैसे वो जीवन और मृत्यु की ज्ञात परिभाषाओं से कहीं दूर निकल आया हो… कहीं बहुत आगे!’

२-“अपने पूर्वजों की तरह तुम यज्ञ के नियमों से बँधे हो।” उसने स्मरण कराया, “मेरी मदद करो! यह मेरा आदेश है!”

 

लेखक का अपना दार्शनिक दृष्टिकोण और पुस्तक की पृष्ठभूमि रचने में किया गया शोध अध्यायांत की सन्दर्भ सूची के अलावा भी झलकता है, निम्न संवाद देखें-

“पीढ़ियों के मामूली अंतर से विज्ञान की लय टूट जाती है। प्रगति के साथ पुराना विज्ञान कौतुक और मजाक का विषय बन जाता है।”

और कहानी के प्रवाह और सस्पेन्स को बनाये रखने के भाषाई प्रयोग भी बहुत सधे हुए और बेहतर  हैं, निम्न संवाद देखें-

“फिलहाल इतना काफी है कि हम आगे बढ़ रहे हैं। सही या गलत दिशा में बढ़ रहे हैं यह आने वाला समय बताएगा।”

“डॉ. वर्मा की बातें तेजी से किसी फिसलन भरे खतरनाक मोड़ की तरफ मुड़ रही थीं!”

और किताब अध्यायान्त में दी हुई सन्दर्भ टिप्पणियों के अलावा भी कई जगह बहुत थ्योरेटिकल हो जाती है, हालांकि यह सब संवाद में होने की वज़ह से रोचक है लेक़िन फिर वही पाठकों के अपने भिन्न आग्रह होने की सीमाएं लेखक के सामने खड़ी हो सकतीं हैं। एक बात के लिए लेखक की भूरि-भूरि प्रशंसा की जानी चाहिए कि कोई भी ऐसा  पौराणिक सन्दर्भ उद्धृत नहीं है,जो वैज्ञानिक तर्कों के दृष्टिकोण से रहित हो,यह इस नई पीढ़ी के लिए बहुत उपयोगी लेखन और पठन का टूल है जो इन विषयों पर लिखने का प्रयत्न करना चाहते हैं।

समेकित रूप से यह कहा जा सकता है कि पौराणिक सनातन परम्परा के आलंबन पर थ्रिलर लिखने का नवीन प्रयास अपने तरकश में सभी तीर लिए हुए है जो अपने तय लक्ष्यों को पूर्ण करेगा।

उपरोक्त समीक्षा मेरे संक्षिप्त अध्ययन और वैचारिक सीमाओं और आग्रहों की सीमा में है अतः यह कोई अन्तिम टिप्पणी नहीं है जिसके आधार पर पाठक अपनी राय बनाएँ।

उपन्यास का यह नूतन प्रयोग और प्रयास सफ़ल हों इसकी लेखक सौरभ कुदेशिया जी को अग्रिम शुभकामनाएं।मुझे इस पुस्तक की समीक्षा लिखने का अवसर प्रदान करने के लिए books in rack संस्था का विशेष आभार!

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