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जटायु पुस्तक समीक्षा – सुशांत शर्मा

‘जटायु’ पढ़ने के बाद जाने क्यों ये अधिकारबोध होता है कि मैं भी इसपर कुछ कह सकता हूँ, क्योंकि यह मात्र सुशान्त शर्मा जी के ‘जटायु-सम्पाती’ नहीं हैं। यह मेरे भी उतने ही अपने हैं। मन का कोई कोना ‘जटायु’ के रंग में रंगा है तो वहीं, कहीं सम्पाती के रंग की हल्दी पुती है।

‘जटायु’ पढ़ने के बाद लगता है कि आलोचना के मानक और समीक्षा की कसौटियाँ, इनकी सीमाएँ हैं। पर ये भी अकाट्य सत्य है कि भाव की कोई सीमा नहीं होती ना ही कल्पना के लिए क्षितिज का कोई छोर। कल्पना तो कहीं भी उन्मुक्त विचरने को स्वतंत्र है और उसी प्रकार भाव भी अभिव्यक्ति को। प्रेम में कृष्ण देवता के रूप में भी अभिव्यक्त हो सकते हैं और छलिया के रूप में भी। निशा के मौन में छत पर लेटा कोई प्रेमी कभी चाँद को हाले-दिल भी सुनाता है तो कभी दूरस्थ प्रियतमा के कुशल-क्षेम की मनुहार भी करता है।

‘जटायु’ पढ़कर भाव के पृष्ठ पर आँखें यही पढ़ पा रही हैं कि एक दिन पूजा की अलमारी में ‘दुर्गासप्तशती’, ‘हनुमान चालीसा’, ‘रामचरितमानस’, ‘गीतावली’, ‘सत्यनारायण व्रत-कथा’ की पोथियों के साथ ‘जटायु’ भी रखी जाएगी।

राम-कथा में गिद्धराज जटायु का प्रसंग आने पर राम-कथा बाँचने वाले संतों-महात्माओं से कोई भावुक रामभक्त खड़ा होकर हाथ जोड़े अनुरोध कर बैठेगा- “महाराज जी! तनिका ‘जटायु’ के पद भी जप लेवल जाय, हमनी के बड़ा मन बा!”

और महाराज जी कह उठेंगें-
“काहें नहीं! बड़ा बढ़िया याद दिअवनी हँ… साधु!”

और गाएंगे-
“अइसन मउअत पावे बदे, हम लाखन जीवन भेंट चढ़इबै।
केतना पुण्य बटोरब जानी ना, जाके तबउ फेर ई गति पउबै।
हे रघुनंदन रोक$ न मोहे, जो रुकबे त$ बड़ा पछतइबै।
गीध के जाति, कुकर्म हो जाई, त अइसन मउअत फेर न पईबै।”

मठों-आश्रमों और मन्दिरों में रामकथा में उद्धरण हेतु ‘जटायु’ के छन्द कोट किये जायेंगे। जब कभी भाई-भाई के अलगाव की बात होगी तो ‘जटायु’ के छन्द दम तोड़ती सम्वेदनाओं और भ्रातृ-वत्सलता के लिए औषधि बन जावेंगे।

सम्पाती के उदात्त और भ्रातृ-वत्सलता का अद्भुत दृश्य उकेरा है भईया ने इन पंक्तियों में-
“छापि लियो निज पाँखिन छाँव में, और जटायु के प्राण बचायो।
धन्य जटायु के भाग्य कि जो, सम्पाती समान है अग्रज पायो।”

जटायु का निश्छल प्रेम देखें-
“रोइ के बोले जटायु सुन$, हम जाउब न तोहसे बिलगा के।
अइसन हाल में साथ ना छोड़ब,भेज$ न तात हमे अलगा के।”

जब क़भी भाई-भाई के प्रेम की बात होगी तो कृष्ण-बलदेव, राम-भरत, राम-लक्ष्मण के साथ ही ‘जटायु-सम्पाती’ का नाम भी लिया जाएगा और जो इन दोनों नामों पर कौतूहल से देखेगा उसको कोई न कोई ‘जटायु’ से छन्द सुनाएगा-

हार स्वीकारि के आपने से हम, आपन मूँह बिगारब नाहीं।
तूँ कुछऊ कहब हम तोहरि, हार के बात उचारब नाहीं।
और बराबरी में तोहसे, हम आपन साँस उखारब नाहीं।
अइसन ई प्रतियोगिता बा, जितबS तूँ तबो हम हारब नाहीं।

छोट जे मान ले जेठ से हार त, काहे के भाई से भाई डेराई।
आपन सीमा में दूनू रहे तब, काहे के भाई से होई लड़ाई।
प्रेम से जीत मिले सबके, अरु प्रेम से पाटहिं वैर की खाई।
कइसे के भाई हुए अलगा, जब एक ही तात आ एक ही माई।

शिक्षा जब इस दौर में है कि शिक्षक और छात्र का रिश्ता दुकानदार और ग्राहक की श्रेणी में आ खड़ा हुआ वहाँ गुरु शब्द की गुरुता, महत्व और मान रखने के लिए जटायु-सम्पाती के ये शब्द काम आयेंगें। गुरु के चिन्ता निवारण हेतु प्रतिबद्ध जटायु की उत्कटता देखें-

“धन जे ना होय तब जीत$ब कुबेर जी के,
अलका में जाई के तहलका मचाई देब।
गाई नाहीं होय त बताई दिहीं हमरा से,
इन्द्र के हरा के कामधेनु के ले आई देब।”

जब-जब मित्र-वत्सलता के नायक के रूप में कृष्ण और कर्ण का नाम लिया जाएगा, समानान्तर ‘जटायु’ का नाम भी राजा दशरथ से मित्रता हेतु लिया जाएगा।

“मुरुछा टूटल अवधेश जी सचेत भइलें,
गिद्धवा के छाती से लगइले पहिचान के।
मितऊ जटायु बोल$ कहवाँ से आई, जाल$
जब-जब बाधा कवनो लागेला परान के।”

जब कोई क्षेत्रीय दम्भ से भरा व्यक्ति भोजपुरी गानों की फूहड़ शब्दावली पर टिप्पणी करेगा तब कोई न कोई भोजपुरिया ठसक से कह सकेगा कि भोजपुरी में श्रृंगार ऐसे भी लिखा गया है-

“एक दुइ लट जब मुख पे लटकि जाले,
लागे कारी लरछुत चन्द्रमा के पास में”

जब कोई प्रवासी घर की यात्रा में होगा और देर हो रही होगी तो मां को याद करके यही पंक्तियाँ ऊचारेगा-

“दाहिनी आँख जे फरकत होई, त, नारी हृदय सिहरावत होइहें।
अइसे में जाई के देवन्ह से,अपनी भिखिया गोहरावत होइहें।
माई के कांपत होई जे देंह, त तात उन्हें समुझावत होइहें।
धीर धर$ तोहरो ललना दुनु, छुई के सुरुज आवत होइहें।”

अवध के अकाल का यह हृदय-विदारक वर्णन, संसार की हर त्रासदी का चेहरा और यदि त्रासदी बोल सकती तो शायद ऐसे ही बोलती-

“पादप के बिन सूनी धरा,अरु,नीर बिना सरिता भई सूनी।
पूत बिना गोदिया भई सूनी,आ,कंत बिना बनिता भई सूनी।
धर्म,बिना तप सून भयो,अरु,आस बिना अँखिया भई सूनी।
जैसे गोपाल बिना ब्रज सून, कि, ओइसन ही अयोध्या भई सूनी।।”

भारत की भूमि पर वीरता के अनगिनत किस्से हैं, उनपर गर्व करते हुए उनके पौरुष को जगाते हुई न जाने कितने ही छन्द हैं। एक छन्द में जटायु का बल विधि के विधान से टकराता हुआ, यह लोमहर्षक और प्रेरक छन्द देखिये-

“जागत ही जगले पुरुषारथ,जागल बा गिद्धराज बघेला।
रावण के संघवा बिधि बा, पर आजु त बाटे ई पच्छी अकेला।
चोंच आ पाँखि जटायू लगे, रवना लगे आयुध के जस मेला।
लेक़िन आज महाबली गिद्ध, प्रताप के ख़ूब देखावत खेला।”

और हर अध्याय भक्तिमय देव-स्तुति से शुरू होता है और एक भक्त का निश्छल हृदय अगर कविता बन जाये तो ऐसी ही बनेगा, माँ अन्नपूर्णा का भजन देखें-

“नाम पुकारत पेट भरे, कि, अशीष तोहार भरें भंडारी।
बालक जइसन विश्व के पोसे लू, तू धन धान से हो महतारी।
देवन्ह पर जब आई विपत्ति, त माँगें ले तोही से भीख पुरारी।
आजु आशीष के हाथ उठाई द,बालक आइल बाटे दुआरी।”

और जटायू मरण,
आह!

“आँख, मुनाइल, छूटल प्राण,श्री राम के गोदि मरे गिद्धराई।
राम के लाख सनेही भये, पर अइसन मृत्यु कहां केहू पाई?
अम्मर हो गइलें गिद्धवा,जग में तोरि अस्तुति गावल जाई।
धन्य जटायू के भाग कि बैठि के, लोर बहाई रहे रघुराई।”

यदि कोई कविता पढ़कर आप रोये नहीं हों तब या तो आपकी आँखों ने ‘जटायु’ में उपरोक्त प्रसंग नहीं पढ़ा है,
या फिर आपके पास कविता पढ़ने वाली आँखें नहीं हैं।
साधु!
प्रशांत द्विवेदी

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